(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 13 अनुशासनपर्व


॥ श्रीः ॥
13.241. अध्यायः 241
अथ दानधर्मपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Topics
महेश्वरेण पार्वतींप्रति प्राणिनां शुभाशुभत्वनिश्चायकलिङ्गकथनम्॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Text

उमोवाच।

मानुषेष्वेव जीवत्सु गतिर्विज्ञायते न वा।
यथा शुभगतिर्जीवो नासौ त्वशुभभागिति॥ 13-241-1(90919)
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तन्मे शंसितुमर्हसि॥ 13-241-2(90920)
महेश्वर उवाच। 13-241-3x(7660)
तदहं ते प्रवक्ष्यामि जीवितं विद्यते यथा।
द्विविधाः प्राणिनो लोके दैवमासुरमाश्रिताः॥ 13-241-3(90921)
मनसा कर्मणा वाचा प्रतिकला भवन्ति ये।
तादृशानासुरान्विद्धि मर्त्यास्ते नरकालयाः॥ 13-241-4(90922)
हिंस्राश्चोराश्च धूर्ताश्च परदाराभिमर्शकाः।
नीचकर्मरता ये च शौचमङ्गलवर्जिताः॥ 13-241-5(90923)
शुचिविद्वेषिणः पापा लोकचारित्रदूषकाः।
एवं युक्तसमाचारा जीवन्तो नरकालयाः॥ 13-241-6(90924)
लोकोद्वेगकराश्चान्ये पशवश्च सरीसृपाः।
वृक्षाः कण्टकिनो रूक्षास्तादृशान्विद्धि चासुरान्॥ 13-241-7(90925)
अपरान्देवपक्षांस्तु शृणु देवि समाहिता॥ 13-241-8(90926)
मनोवाक्कर्मभिर्नित्यमनुकूला भवन्ति ये।
तादृशानमरान्विद्धि ते नराः स्वर्गगामिनः॥ 13-241-9(90927)
शौचार्जवपरा धीराः परार्थं नाहरन्ति ये।
ये समाः सर्वभूतेषु ते नराः स्वर्गगामिनः॥ 13-241-10(90928)
भयाद्वा वृत्तिहेतोर्वा अनृतं न वदन्ति ये।
सत्यं वदन्ति सततं ते नराः स्वर्गगामिनः॥ 13-241-11(90929)
धार्मिकाः शौचसम्पन्नाः शुक्ला मधुरवादिनः।
नाकार्यं मनसेच्छन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः॥ 13-241-12(90930)
स्वदुःखमिव मन्यन्ते परेषां दुःखवेदनम्।
दरिद्रा अपि ये केचिद्याचिताः प्रीतिपूर्वकम्।
ददत्येव च यत्किञ्चित्ते नराः स्वर्गगामिनः॥ 13-241-13(90931)
आस्तिका मङ्गलपराः सततं वृद्धसेविनः।
पुण्यकर्मपरा नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः॥ 13-241-14(90932)
व्रतिनो दानशीलाश्च धर्मशीलाश्च मानवाः॥
ऋजवो मृदवो नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः॥ 13-241-15(90933)
गुरुशुश्रूषणपरा देवब्राह्मणपूजकाः।
कृजज्ञाः कृतविद्याश्च ते नराः स्वर्गगामिनः॥ 13-241-16(90934)
जितेन्द्रिया जितक्रोधा जितमानमदाः स्मृताः।
लोभमात्सर्यहीना ये ते नराः स्वर्गगामिनः॥ 13-241-17(90935)
निर्मा निरहङ्कारः सानुक्रोशाः स्वबन्धुषु।
दीनानुकम्पिनो नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः॥ 13-241-18(90936)
ऐहिकेन तु वृत्तेन पारत्रमनुमीयते।
एवंविधा नरा लोके जीवन्तः स्वर्गगामिनः॥ 13-241-19(90937)
यदन्यच्च शुभं लोके प्रजानुग्रहकारि च।
पशवश्चैव वृक्षाश्च प्रजानां हितकारिणः।
तादृशान्देवपक्षस्थानिति विद्धि शुभानने॥ 13-241-20(90938)
शुभाशुभप्रयं लोके सर्वं स्थावरजङ्गमम्।
दैवं शुभमिति प्राहुरासुरं चाशुभं प्रिये॥ ॥ 13-241-21(90939)

इति श्रीमन्यहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि एकचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ 241 ॥


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